43 ଚାଷୀମାନେ ମୁକ୍ତା ଚାଷ କରି ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ରୋଜଗାର କରିପାରିବେ। ଏହା କିପରି କରିବେ ତାହା ଏଠାରେ ଦିଆଯାଇଛି।
ଚାଷୀମାନେ ମୁକ୍ତା ଚାଷ କରି ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ରୋଜଗାର କରିପାରିବେ। ଏହା କିପରି କରିବେ ତାହା ଏଠାରେ ଦିଆଯାଇଛି।
ମୁକ୍ତା ହେଉଛି ସିପ୍ରୁ ଉତ୍ପାଦିତ ଏକ ପ୍ରାକୃତିକ ରତ୍ନପଥର। ଭାରତ ସମେତ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶରେ ମୁକ୍ତାର ଚାହିଦା ବଢ଼ୁଛି, କିନ୍ତୁ ଅତ୍ୟଧିକ ଶୋଷଣ ଏବଂ ପ୍ରଦୂଷଣ ଯୋଗୁଁ ଏଗୁଡ଼ିକର ସଂଖ୍ୟା ହ୍ରାସ ପାଉଛି। ଘରୋଇ ଚାହିଦା ପୂରଣ କରିବା ପାଇଁ, ଭାରତ ପ୍ରତିବର୍ଷ ଅନ୍ତର୍ଜାତୀୟ ବଜାରରୁ ବହୁ ପରିମାଣରେ ମୁକ୍ତା ଆମଦାନୀ କରିଥାଏ। ପୂର୍ବରୁ, କେବଳ ସମୁଦ୍ରରୁ ମୁକ୍ତା ମିଳୁଥିଲା। ପରେ, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ହ୍ରଦ, ପୋଖରୀ ଏବଂ ନଦୀରେ ମଧ୍ୟ କୃତ୍ରିମ ଭାବରେ ଚାଷ କରାଯିବା ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥିଲା। ପାରସ୍ୟ ଉପସାଗର, ଶ୍ରୀଲଙ୍କା, ଭେନେଜୁଏଲା, ମେକ୍ସିକୋ, ଅଷ୍ଟ୍ରେଲିଆ ଏବଂ ବଙ୍ଗୋପସାଗରରେ ମୁକ୍ତା ମିଳିଥାଏ।
ଭାରତରେ, ମୁଖ୍ୟତଃ ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତର ତାମିଲନାଡୁ ରାଜ୍ୟର ଟୁଟିକୋରିନ ଏବଂ ବିହାରର ଦରଭଙ୍ଗା ଜିଲ୍ଲାରୁ ମୁକ୍ତା ମିଳିଥାଏ। ବର୍ତ୍ତମାନ, ଚୀନ୍ ଏବଂ ଜାପାନରେ ସର୍ବାଧିକ ସଂଖ୍ୟକ ମୁକ୍ତା ଉତ୍ପାଦିତ ହୁଏ। ପାରସ୍ୟ ଉପସାଗରରେ ଉତ୍ପାଦିତ ମୁକ୍ତାକୁ ବାସରା ମୁକ୍ତା ଭାବରେ ଜଣାଯାଏ, ଯାହାକୁ ସର୍ବୋତ୍ତମ ବୋଲି ବିବେଚନା କରାଯାଏ। ଆଜି ଅନେକ ରଙ୍ଗରେ ମୁକ୍ତା ଉପଲବ୍ଧ। ଧଳା, କଳା, ଗୋଲାପୀ, ହଳଦିଆ ଏବଂ କଳା ରଙ୍ଗର ମୁକ୍ତାକୁ (ତାହିତି) କୁହାଯାଏ। ଏହି ଗାଢ଼ ମୁକ୍ତା ମହିଳାଙ୍କ ବେକରେ ସୁନ୍ଦର ଦେଖାଯାଏ। ଅଷ୍ଟ୍ରେଲିଆରୁ ମିଳୁଥିବା ହାଲୁକା ହଳଦିଆ ମୁକ୍ତା ବିରଳ। ଏଗୁଡ଼ିକୁ ଦକ୍ଷିଣ-ମୁକ୍ତ ମୁକ୍ତା ଭାବରେ ଜଣାଯାଏ। ଆକୋୟା ମୁକ୍ତା ସାଧାରଣ।
ତିନି ପ୍ରକାରର ମୁକ୍ତା ଅଛି:
KVT - ଏକ ଅଇଷ୍ଟର ଭିତରେ ଏକ ବିଦେଶୀ ଶରୀର ପ୍ରବେଶ କରି ଏକ ମୁକ୍ତା ସୃଷ୍ଟି କରାଯାଏ। ଏହାକୁ ଅଙ୍ଗୁଠି ଏବଂ ଲକେଟରେ ବ୍ୟବହାର କରାଯାଏ। ଏହାର ଚମତ୍କାର ଦୃଶ୍ୟ ହେତୁ, ଗୋଟିଏ ମୁକ୍ତାର ମୂଲ୍ୟ ହଜାର ହଜାର ଟଙ୍କା ହୋଇପାରେ।
ଗୋନଟ୍ - ଏଠାରେ ଏକ ପ୍ରାକୃତିକ ଭାବରେ ଗୋଲାକାର ମୁକ୍ତା ସୃଷ୍ଟି କରାଯାଏ। ମୁକ୍ତା ଚମତ୍କାର ଏବଂ ସୁନ୍ଦର। ଏହାର ଆକାର ଏବଂ ଚମକ ଉପରେ ନିର୍ଭର କରି ଗୋଟିଏ ମୁକ୍ତାର ମୂଲ୍ୟ 1,000 ରୁ 50,000 ଟଙ୍କା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ହୋଇଥାଏ।
ମାନସିକ ଟିସୁ - ଅଇଷ୍ଟର ଶରୀରର ଏକ ଅଂଶ ଅଇଷ୍ଟର ଭିତରେ ପ୍ରବେଶ କରାଯାଏ। ଏହି ମୁକ୍ତା ମୁକ୍ତା ପାଉଁଶ, ଚ୍ୟବନପ୍ରାଶ ଏବଂ ଟନିକ୍ସ ଭଳି ଖାଦ୍ୟ ସାମଗ୍ରୀ ପ୍ରସ୍ତୁତିରେ ବ୍ୟବହୃତ ହୁଏ। ବଜାରରେ ଏହାର ଚାହିଦା ଅଧିକ।
ଏହିପରି ମୁକ୍ତା ଗଠିତ ହୁଏ।
ଏକ ମୋଲସ୍କ, ଏକ ମୋଲସ୍କ, ନିଜ ଶରୀରରୁ ନିଷ୍କାସିତ ଏକ ଖସିଯିବା ତରଳ ପଦାର୍ଥ ବ୍ୟବହାର କରି ନିଜର ଘର ତିଆରି କରେ। ଏକ ଶାମୁକାର ଘରକୁ ଏକ ଖୋଳ କୁହାଯାଏ। ଏହି କଞ୍ଚା ଭିତରେ, ଏହା ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କଠାରୁ ସୁରକ୍ଷିତ ରହିଥାଏ। ହଜାର ହଜାର ପ୍ରକାରର ଶାମୁକା ଅଛି, ଏବଂ ସେମାନଙ୍କର କଞ୍ଚା ଗୋଲାପୀ, ଲାଲ, ହଳଦିଆ, କମଳା, ମାଟିଆ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ବିଭିନ୍ନ ରଙ୍ଗରେ ଆସିଥାଏ ଏବଂ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆକର୍ଷଣୀୟ। ମୁକ୍ତା ଉତ୍ପାଦନକାରୀ ପ୍ରଜାତି ଶାମୁକାକୁ ବାଇଭାଲ୍ଭ କୁହାଯାଏ, ଏବଂ ଏମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ, ଓଏଷ୍ଟର ଶାମୁକା ସର୍ବାଧିକ ମୁକ୍ତା ଉତ୍ପାଦନ କରେ। ମୁକ୍ତା ଗଠନ ମଧ୍ୟ ଏକ ଆକର୍ଷଣୀୟ ପ୍ରକ୍ରିୟା। ଯେତେବେଳେ ଶାମୁକା କେତେକ ସମୟରେ ବାୟୁ, ପାଣି ଏବଂ ଖାଦ୍ୟର ଆବଶ୍ୟକତା ପୂରଣ କରିବା ପାଇଁ ସେମାନଙ୍କର କଞ୍ଚା ଖୋଲିଥାଏ, ସେତେବେଳେ ବାଲି କଣିକା ଏବଂ କୀଟପତଙ୍ଗ ଭଳି ବିଦେଶୀ ସାମଗ୍ରୀ ଖୋଲାରେ ପ୍ରବେଶ କରେ। ଶାମୁକା ତା’ପରେ ଏହି ବିଦେଶୀ ସାମଗ୍ରୀଗୁଡ଼ିକୁ ଏହାର ଚର୍ମରୁ ନିଷ୍କାସିତ ଏକ ଖସିଯିବା ତରଳ ପଦାର୍ଥ ସହିତ ଆବରଣ କରେ।
ଭାରତ ସମେତ ଅନେକ ଦେଶରେ ମୁକ୍ତାର ଚାହିଦା ବୃଦ୍ଧି ପାଉଛି, କିନ୍ତୁ ଅତ୍ୟଧିକ ଶୋଷଣ ଏବଂ ପ୍ରଦୂଷଣ ଯୋଗୁଁ ସେମାନଙ୍କର ଉତ୍ପାଦନ ହ୍ରାସ ପାଉଛି। ଏହାର ଘରୋଇ ଚାହିଦା ପୂରଣ କରିବା ପାଇଁ, ଭାରତ ପ୍ରତିବର୍ଷ ଅନ୍ତର୍ଜାତୀୟ ବଜାରରୁ ବହୁ ପରିମାଣରେ ମୁକ୍ତା ଆମଦାନୀ କରେ। ମୋ ଦେଶର ଭୂମି ସୁନା, ହୀରା ଏବଂ ମୁକ୍ତା ଉତ୍ପାଦନ କରେ। ପ୍ରକୃତରେ, ଆମ ଦେଶରେ ବିସ୍ତୃତ ଉପକୂଳ ଏବଂ ଅନେକ ଚିରସ୍ଥାୟୀ ନଦୀ, ଜଳପ୍ରପାତ ଏବଂ ପୋଖରୀ ରହିଛି। ମାଛ ଚାଷ ସହିତ, ଆମର ବେକାର ଯୁବକ ଏବଂ ଚାଷୀମାନେ ଏବେ ମୁକ୍ତା ଚାଷ କରି ଭଲ ଲାଭ ପାଇପାରିବେ।
କିପରି ଚାଷ କରିବେ
ମୋତି ଚାଷ ପାଇଁ ସବୁଠାରୁ ଅନୁକୂଳ ଋତୁ ହେଉଛି ଶରତ ଋତୁ, ଅକ୍ଟୋବରରୁ ଡିସେମ୍ବର। ଅତି କମରେ 10 ବାଇ 10 ଫୁଟ କିମ୍ବା ତା'ଠାରୁ ବଡ଼ ପୋଖରୀରେ ମୁକ୍ତା ଚାଷ କରାଯାଇପାରିବ। 0.4 ହେକ୍ଟର ଭଳି ଏକ ଛୋଟ ପୋଖରୀରୁ 25,000 ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୁକ୍ତା ଉତ୍ପାଦନ କରାଯାଇପାରିବ। ମୁକ୍ତା ଚାଷ ଆରମ୍ଭ କରିବା ପାଇଁ, ଚାଷୀମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଥମେ ପୋଖରୀ, ନଦୀରୁ ସିପ୍ ସଂଗ୍ରହ କରିବାକୁ ପଡିବ, କିମ୍ବା ସେଗୁଡ଼ିକୁ କିଣିବା ଉଚିତ। ଏହା ପରେ, ଏକ ଛୋଟ ଅସ୍ତ୍ରୋପଚାର ପରେ, ସରଳ କିମ୍ବା ଡିଜାଇନର ମଣି, ଯେପରିକି ଗଣେଶ, ବୁଦ୍ଧ, କିମ୍ବା 4 ରୁ 6 ମିମି ବ୍ୟାସ ପରି ଫୁଲର ମୋଟିଫ୍, ପ୍ରତ୍ୟେକ ସିପ୍ ଭିତରେ ଭର୍ତି କରାଯାଏ। ତା'ପରେ ସିଲ୍ କରାଯାଏ। ଏହି ସିପ୍ଗୁଡ଼ିକୁ ଆଣ୍ଟିବାୟୋଟିକ୍ ଏବଂ ପ୍ରାକୃତିକ ଖାଦ୍ୟରେ 10 ଦିନ ପାଇଁ ନାଇଲନ୍ ବ୍ୟାଗରେ ରଖାଯାଏ। ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରତିଦିନ ଯାଞ୍ଚ କରାଯାଏ, ଏବଂ ମୃତ ସିପ୍ଗୁଡ଼ିକୁ ବାହାର କରାଯାଏ। ଏହି ସିପ୍ଗୁଡ଼ିକୁ ତା'ପରେ ପୋଖରୀରେ ଛାଡି ଦିଆଯାଏ। ଏଥିପାଇଁ, ସେମାନଙ୍କୁ ନାଇଲନ୍ ବ୍ୟାଗରେ (ପ୍ରତି ବ୍ୟାଗରେ ଦୁଇଟି ସିପ୍) ରଖାଯାଇଥାଏ ଏବଂ ବାଉଁଶ କିମ୍ବା PVC ପାଇପ୍ ରୁ ଝୁଲାଇ ଏକ ମିଟର ଗଭୀରତାରେ ପୋଖରୀରେ ଛାଡି ଦିଆଯାଏ। ପ୍ରତି ହେକ୍ଟରରେ 20,000 ରୁ 30,000 ସିପ୍ ହାରରେ ଏମାନଙ୍କୁ ପାଳନ କରାଯାଇପାରିବ। ଭିତରୁ ନିର୍ଗତ ପଦାର୍ଥ ନ୍ୟୁକ୍ଲିୟସ୍ ଚାରିପାଖରେ ଜମା ହେବା ଆରମ୍ଭ କରେ, ଯାହା ଶେଷରେ ଏକ ମୁକ୍ତା ଗଠନ କରେ। ପ୍ରାୟ 8-10 ମାସ ପରେ, ସିପ୍ କାଟି ମୁକ୍ତା ବାହାର କରାଯାଏ।
କମ ମୂଲ୍ୟ, ଅଧିକ ଲାଭ
ପ୍ରତ୍ୟେକ ସିପ୍ ପାଇଁ ପ୍ରାୟ 20 ରୁ 30 ଟଙ୍କା ଖର୍ଚ୍ଚ ହୁଏ। 1mm ରୁ 20mm ସିପ୍ ମୁକ୍ତାର ବଜାର ମୂଲ୍ୟ ପ୍ରାୟ ₹300 ରୁ ₹1500 ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ। ଡିଜାଇନର୍ ମୁକ୍ତା ଆଜିକାଲି ଅଧିକ ଲୋକପ୍ରିୟ ହେଉଛି, ଭଲ ମୂଲ୍ୟ ପାଉଛି। ଭାରତୀୟ ବଜାର ତୁଳନାରେ ବିଦେଶୀ ବଜାରକୁ ମୁକ୍ତା ରପ୍ତାନି କରିବା ଅଧିକ ଲାଭଦାୟକ। ଏହା ବ୍ୟତୀତ, ମୁକ୍ତା ବାହାର କରିବା ପରେ, ଖୋଳଗୁଡ଼ିକୁ ବଜାରରେ ବିକ୍ରି କରାଯାଇପାରିବ। ସିପ୍ ରୁ ଅନେକ ସାଜସଜ୍ଜା ସାମଗ୍ରୀ ତିଆରି କରାଯାଏ, ଯେପରିକି ସିଲିଂ ଚନ୍ଦନ, ଆକର୍ଷଣୀୟ ଫ୍ରିଞ୍ଜ ଏବଂ ଫୁଲଦାନୀ। ବର୍ତ୍ତମାନ, କନୌଜରେ, ସିପ୍ ରୁ ସୁଗନ୍ଧି ତେଲ ନିଷ୍କାସନ ମଧ୍ୟ ବଡ଼ ପରିମାଣରେ କରାଯାଉଛି, ଯାହା ଫଳରେ ସ୍ଥାନୀୟ ବଜାରରେ ସିପ୍ ସହଜରେ ବିକ୍ରି ହୋଇପାରିବ। ଓଏଷ୍ଟର ନଦୀ ଏବଂ ପୋଖରୀ ପାଣିକୁ ବିଶୁଦ୍ଧ କରିଥାଏ, ଯାହା ଜଳ ପ୍ରଦୂଷଣ ସମସ୍ୟାକୁ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବରେ ସମାଧାନ କରିଥାଏ।
ଚାଷୀ ଏବଂ ବେକାର ଛାତ୍ରମାନେ ମରୁଡି ଏବଂ ଦୁର୍ଭିକ୍ଷର ଶିକାର ହେଉଛନ୍ତି।
ଚାଷୀମାନେ ମୁକ୍ତା ଚାଷ କରି ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ରୋଜଗାର କରିପାରିବେ। ଏହା କିପରି କରିବେ ତାହା ଏଠାରେ ଦିଆଯାଇଛି। https://jaibik-kheti.blogspot.com/2025/03/43.html
ମୁକ୍ତା ଚାଷ ଆରମ୍ଭ କରନ୍ତୁ, ମାସିକ ₹1 ଲକ୍ଷ ଆୟ କରନ୍ତୁ! ସରକାର ତାଲିମ ପ୍ରଦାନ କରୁଛନ୍ତି। https://jaibik-kheti.blogspot.com/2025/03/44.html
୧୦x୧୦ ଫୁଟ ପୋଖରୀରୁ ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ରୋଜଗାର https://jaibik-kheti.blogspot.com/2025/03/08.html
मोती की खेती करके किसान कमा सकता है लाखो रूपये, ऐसे करे खेती

मोती एक प्राकृतिक रत्न है जो सीप से पैदा होता है। भारत समेत हर देश में मोतियों की माँग बढ़ती जा रही है, लेकिन दोहन और प्रदूषण से इनकी संख्यौ घटती जा रही है। अपनी घरेलू माँग को पूरा करने के लिए भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार से हर साल मोतियों का बड़ी मात्रा में आयात करता है। पहले मोती केवल समुद्र से ही प्राप्त होते थे बाद में इन्हें कृत्रिम रूप से झील, तलाब, नदी आदि में मोती की खेती करके भी बनाया जाने लगा है। म¨ती फारस की खाड़ी, श्रीलंका, बेनेजुएला, मैक्सिको ,आस्ट्रेलिया तथा बंगाल की खाड़ी में पाए जाते हैं।
भारत में मोती मुख्यतः दक्षिण भारत के तमिलनाडू राज्य के ततूतीकेरन तथा बिहार के दरभंगा जिले से प्राप्त होते है। वर्तमान समय में सबसे अधिक मोती चीन तथा जापान में उत्पन्न होते है। फारस की खाड़ी में उत्पन्न ह¨ने वाले म¨ती क¨ ही बसरे का म¨ती कहा जाता है जिसे सवर्¨त्तम माना गया है। आजकल मोती कई रंगो में मिलते हैं। जैसे श्वेत, श्याम, गुलाबी व पीत वर्ण व श्याम वर्ण के मोतियों को (तहीती) कहते हैं। ये काले रंग के मोती महिलाओं के गले में बहुत सुंदर लगते हैं। आस्ट्रेलिया के हल्के पीत वर्ण के मोती दुर्लभ होते हैं। इन्हें साउथ-पी पर्ल के नाम से जाना जाता है। अकोया नामक मोती साधारण होते हैं।
तीन प्रकार के होते हैं मोती
केवीटी- सीप के अंदर ऑपरेशन के जरिए फारेन बॉडी डालकर मोती तैयार किया जाता है। इसका इस्तेमाल अंगूठी और लॉकेट बनाने में होता है। चमकदार होने के कारण एक मोती की कीमत हजारों रुपए में होती है।
गोनट- इसमें प्राकृतिक रूप से गोल आकार का मोती तैयार होता है। मोती चमकदार व सुंदर होता है। एक मोती की कीमत आकार व चमक के अनुसार 1 हजार से 50 हजार तक होती है।
मेंटलटीसू- इसमें सीप के अंदर सीप की बॉडी का हिस्सा ही डाला जाता है। इस मोती का उपयोग खाने के पदार्थों जैसे मोती भस्म, च्यवनप्राश व टॉनिक बनाने में होता है। बाजार में इसकी सबसे ज्यादा मांग है।
ऐसे बनता है मोती
घोंघा नाम का एक कीड़ा जिसे मॉलस्क कहते हैं, अपने शरीर से निकलने वाले एक चिकने तरल पदार्थ द्वारा अपने घर का निर्माण करता है। घोंघे के घर को सीपी कहते हैं। इसके अन्दर वह अपने शत्रुओं से भी सुरक्षित रहता है। घोंघों की हजारों किस्में हैं और उनके शेल भी विभिन्न रंगों जैसे गुलाबी, लाल, पीले, नारंगी, भूरे तथा अन्य और भी रंगों के होते हैं तथा ये अति आकर्षक भी होते हैं। घोंघों की मोती बनाने वाली किस्म बाइवाल्वज कहलाती है इसमें से भी ओएस्टर घोंघा सर्वाधिक मोती बनाता है। मोती बनाना भी एक मजेदार प्रक्रिया है। वायु, जल व भोजन की आवश्यकता पूर्ति के लिए कभी-कभी घोंघे जब अपने शेल के द्वार खोलते हैं तो कुछ विजातीय पदार्थ जैसे रेत कण कीड़े-मकोड़े आदि उस खुले मुंह में प्रवेश कर जाते हैं। घोंघा अपनी त्वचा से निकलने वाले चिकने तरल पदार्थ द्वारा उस विजातीय पदार्थ पर परतें चढ़ाने लगता है।
भारत समेत अनेक देशों में मोतियों की माँग बढ़ती जा रही है, लेकिन दोहन और प्रदूषण से इनका उत्पादन घटता जा रहा है। अपनी घरेलू माँग को पूरा करने के लिए भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार से हर साल मोतियों का बड़ी मात्रा में आयात करता है। मेरे देश की धरती , सोना उगले, उगले हीरे-मोती। वास्तव में हमारे देश में विशाल समुन्द्रिय तटों के साथ ढेरों सदानीरा नदियां, झरने और तालाब मौजूद है। इनमें मछली पालन अलावा हमारे बेरोजगार युवा एवं किसान अब मोती पालन कर अच्छा मुनाफा कमा सकते है।
कैसे करते हैं खेती
मोती की खेती के लिए सबसे अनुकूल मौसम शरद ऋतु यानी अक्टूबर से दिसंबर तक का समय माना जाता है। कम से कम 10 गुणा 10 फीट या बड़े आकार के तालाब में मोतियों की खेती की जा सकती है। मोती संवर्धन के लिए 0.4 हेक्टेयर जैसे छोटे तालाब में अधिकतम 25000 सीप से मोती उत्पादन किया जा सकता है। खेती शुरू करने के लिए किसान को पहले तालाब, नदी आदि से सीपों को इकट्ठा करना होता है या फिर इन्हे खरीदा भी जा सकता है। इसके बाद प्रत्येक सीप में छोटी-सी शल्य क्रिया के उपरान्त इसके भीतर 4 से 6 मिली मीटर व्यास वाले साधारण या डिजायनदार बीड जैसे गणेश, बुद्ध, पुष्प आकृति आदि डाले जाते है । फिर सीप को बंद किया जाता है। इन सीपों को नायलॉन बैग में 10 दिनों तक एंटी-बायोटिक और प्राकृतिक चारे पर रखा जाता है। रोजाना इनका निरीक्षण किया जाता है और मृत सीपों को हटा लिया जाता है। अब इन सीपों को तालाबों में डाल दिया जाता है। इसके लिए इन्हें नायलॉन बैगों में रखकर (दो सीप प्रति बैग) बाँस या पीवीसी की पाइप से लटका दिया जाता है और तालाब में एक मीटर की गहराई पर छोड़ दिया जाता है। प्रति हेक्टेरयर 20 हजार से 30 हजार सीप की दर से इनका पालन किया जा सकता है। अन्दर से निकलने वाला पदार्थ नाभिक के चारों ओर जमने लगता है जो अन्त में मोती का रूप लेता है। लगभग 8-10 माह बाद सीप को चीर कर मोती निकाल लिया जाता है।
कम लागत ज्यादा मुनाफा
एक सीप लगभग 20 से 30 रुपए की आती है। बाजार में 1 मिमी से 20 मिमी सीप के मोती का दाम करीब 300 रूपये से लेकर 1500 रूपये होता है। आजकल डिजायनर मोतियों को खासा पसन्द किया जा रहा है जिनकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। भारतीय बाजार की अपेक्षा विदेशी बाजार में मोतिओ का निर्यात कर काफी अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। तथा सीप से मोती निकाल लेने के बाद सीप को भी बाजार में बेंचा जा सकता है। सीप द्वारा कई सजावटी सामान तैयार किये जाते है। जैसे कि सिलिंग झूमर, आर्कषक झालर, गुलदस्ते आदि वही वर्तमान समय में सीपों से कन्नौज में इत्र का तेल निकालने का काम भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। जिससे सीप को भी स्थानीय बाजार में तत्काल बेचा जा सकता है। सीपों से नदीं और तालाबों के जल का शुद्धिकरण भी होता रहता है जिससे जल प्रदूषण की समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है।
सूखा-अकाल की मार झेल रहे किसानों एवं बेरोजगार छात्र-छात्राओं को मीठे पानी में मोती संवर्धन के क्षेत्र में आगे आना चाहिए क्योंकि मोतीयों की मांग देश विदेश में बनी रहने के कारण इसके खेती का भविष्य उज्जवल प्रतीत होता है। भारत के अनेक राज्यों के नवयुवकों ने मोती उत्पादन को एक पेशे के रूप में अपनाया है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ राज्य में भी मोती उत्पादन की बेहतर संभावना है। मोती संवर्द्धन से सम्बधित अधिक जानकारी के लिए सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वााकल्चर, भुवनेश्वंर (ओडीसा) से संपर्क किया जा सकता है । यह संस्थान ग्रामीण नवयुवकों, किसानों एवं छात्र-छात्राओँ को मोती उत्पादन पर तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करता है। किसान हैल्प भी किसानों एवं छात्र-छात्राओँ को मोती उत्पादन पर तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करता है।
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