03 ଜୈବିକ ବନାମ ରାସାୟନିକ କୃଷି
ଜୈବିକ ବନାମ ରାସାୟନିକ କୃଷି
ସାଧାରଣତଃ ବିଶ୍ୱାସ କରାଯାଏ ଯେ ବହୁ ପରିମାଣରେ ରାସାୟନିକ ସାର ଏବଂ କୀଟନାଶକ ବ୍ୟବହାର ଦ୍ୱାରା ଉତ୍ପାଦନ ବୃଦ୍ଧି ପାଇପାରେ, ଏବଂ ଏହି ବର୍ଦ୍ଧିତ ଉତ୍ପାଦନ ଚାଷୀଙ୍କ ଲାଭ ବୃଦ୍ଧି କରିପାରିବ। ସରକାର ଚାଷୀମାନଙ୍କୁ ବୈଜ୍ଞାନିକ କୃଷି ଅଭ୍ୟାସ କରିବାକୁ ମଧ୍ୟ ପରାମର୍ଶ ଦିଅନ୍ତି, କିନ୍ତୁ ଏହି ବୈଜ୍ଞାନିକ ପଦ୍ଧତି କେବଳ ରାସାୟନିକ ସାର ଏବଂ କୀଟନାଶକ ବ୍ୟବହାର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସୀମିତ। ଫଳସ୍ୱରୂପ, ଆମେ ବିଦର୍ଭ, ଆନ୍ଧ୍ର ପ୍ରଦେଶ, ଗୁଜରାଟ, ପଞ୍ଜାବ ଏବଂ ଉତ୍ତର ପ୍ରଦେଶରେ ଚାଷୀମାନେ ଆତ୍ମହତ୍ୟା କରୁଥିବାର ପ୍ରତିଦିନ ଖବର ଶୁଣିବାକୁ ପାଉଛୁ। ଏହା ବ୍ୟତୀତ, ରାସାୟନିକ ସାର ଏବଂ କୀଟନାଶକର ବ୍ୟବହାର ମାନବ ଜୀବନର ମୁଖ୍ୟ ଶସ୍ୟ, ପନିପରିବା, କ୍ଷୀର ଏବଂ ପାଣିକୁ ବିଷାକ୍ତ କରୁଛି। ଏହା ଧୀରେ ଧୀରେ ମାନବ ଜୀବନକୁ ବିପଦରେ ପକାଇଛି। ହୃଦଘାତ, ମଧୁମେହ, ରକ୍ତଚାପ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ରୋଗ ସାଧାରଣ ହେବାରେ ଲାଗିଛି। ଆମେ ଯାହା ଖାଉଛୁ ସେଥିରେ ରାସାୟନିକ ପରିମାଣ ଏତେ ଅଧିକ ଯେ ଆମର ଖାଦ୍ୟ ମିଠା ବିଷ ପାଲଟିଛି।
ଫସଲ ଉତ୍ପାଦନ ପାଇଁ ରାସାୟନିକ ସାରର ଅବାଧ ବ୍ୟବହାର କେବଳ ମାନବ ଜୀବନ ପାଇଁ ବିପଦ ସୃଷ୍ଟି କରେ ନାହିଁ ବରଂ ଭୂମିକୁ ଅନୁର୍ବର କରିଥାଏ। ମାଟିର ଉର୍ବରତା ହ୍ରାସ ପାଉଛି। ଉତ୍ପାଦନ ବୃଦ୍ଧି କରିବା ପାଇଁ, ରାସାୟନିକ ସାରର ପରିମାଣ ନିରନ୍ତର ବୃଦ୍ଧି କରିବାକୁ ପଡିବ। ମାଟିରେ ଜୀବାଶ୍ମ ଇନ୍ଧନର ପରିମାଣ ହ୍ରାସ ପାଉଛି, ଯାହା ମାଟିର ଭୌତିକ ଗଠନ ଏବଂ ରାସାୟନିକ ଗୁଣ ଉପରେ ପ୍ରତିକୂଳ ପ୍ରଭାବ ପକାଉଛି। ଏବେ ପ୍ରଶ୍ନ ହେଉଛି, ଏହି ସମସ୍ତ ସମସ୍ୟାର କୌଣସି ସମାଧାନ ନାହିଁ କି? ଏହାର ଏକ ସମାଧାନ ଅଛି, ଏହି ସମସ୍ତ ସମସ୍ୟାର ଏକମାତ୍ର ସମାଧାନ ହେଉଛି ଜୈବିକ କୃଷି। ମାଟିର ଉର୍ବରତା ବୃଦ୍ଧି କରିବାରେ ଭର୍ମିକମ୍ପୋଷ୍ଟ ସହାୟକ ପ୍ରମାଣିତ ହେଉଛି। ଜୈବିକ କୃଷି ରାସାୟନିକ କୃଷି ଅପେକ୍ଷା ଶସ୍ତା କାରଣ ଏହାର କଞ୍ଚାମାଲ ଚାଷୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଉପଲବ୍ଧ, ଯେପରିକି ଗୋବରରୁ କମ୍ପୋଷ୍ଟ ଖତ, ଚାରା ଏବଂ ଫସଲ ଅବଶିଷ୍ଟାଂଶରୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ଖତ, ଏବଂ କେଞ୍ଚୁଆ ଖତ।
ଏପିଜିକ୍ କେଞ୍ଚୁଆ (ଲାଲ ପୋକ) ର ଆଇସେନିଆ ଫେଟିଡା ପ୍ରଜାତିର ଜୈବିକ ସାର ଉତ୍ପାଦନ କରାଯାଇପାରିବ। ଭାର୍ମିକମ୍ପୋଷ୍ଟ ଶସ୍ତା ଏବଂ ମାଟିର ଉର୍ବରତା ମଧ୍ୟ ବୃଦ୍ଧି କରେ। ଏହା କମ ପାଣିରେ ଚାଷ କରିବା ସମ୍ଭବ କରିଥାଏ। ଏହା ଉତ୍ପାଦନ ଖର୍ଚ୍ଚ ମଧ୍ୟ ହ୍ରାସ କରିଥାଏ। ଜୈବିକ ଭାବରେ ଉତ୍ପାଦିତ ଶସ୍ୟ ସ୍ୱାଦିଷ୍ଟ ଏବଂ ସୁସ୍ଥ ହୋଇଥାଏ। ଅନେକ ସଂଗଠନ ଏବଂ କୃଷି ବିଭାଗ ଜୈବିକ କୃଷି କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରୟାସ ଆରମ୍ଭ କରିଛନ୍ତି। ଦେଶର ପ୍ରାୟ ସମସ୍ତ ରାଜ୍ୟରେ ଜୈବିକ କୃଷି ବିଷୟରେ ସୂଚନା ଏବଂ ପ୍ରୋତ୍ସାହନ ଯୋଗାଇ ଦିଆଯାଉଛି। ଅନେକ ଚାଷୀ ଜୈବିକ କୃଷି ଗ୍ରହଣ କରିଛନ୍ତି। କୃଷି ବିଭାଗ ଚାଷୀମାନଙ୍କୁ ଗୋବର ଏବଂ କେଞ୍ଚୁଆରୁ ଜୈବିକ ସାର ଏବଂ ଭର୍ମିକମ୍ପୋଷ୍ଟ ଆକାରରେ କୀଟନାଶକ ତିଆରି କରିବାକୁ ତାଲିମ ଦିଏ। ଗୋମୁତ୍ର, ନିମ, ହଳଦୀ ଏବଂ ରସୁଣରୁ ହର୍ବାଲ ସ୍ପ୍ରେ ତିଆରି କରାଯାଏ।
ଜୈବିକ କୃଷି ଆଜି କୃଷକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏକ ଉପକାରକ ପ୍ରମାଣିତ ହେଉଛି। ବିଶେଷଜ୍ଞମାନେ କ୍ଷେତକୁ ଯାତ୍ରା କରି ଚାଷୀଙ୍କ ଅଭିଜ୍ଞତା ରେକର୍ଡ କରିଛନ୍ତି, ଏବଂ ଏବେ ଏହି ଅଭିଜ୍ଞତାଗୁଡ଼ିକୁ ଆପଣମାନଙ୍କ ସହିତ ବାଣ୍ଟିବାକୁ ପ୍ରୟାସ କରାଯାଉଛି ଯାହା ଦ୍ଵାରା ଦେଶର ଅନ୍ୟ ଚାଷୀମାନେ ପ୍ରେରଣା ପାଇପାରିବେ। ପ୍ରାୟତଃ ବିଶ୍ୱାସ କରାଯାଏ ଯେ ଜୈବିକ କୃଷି ଅମଳ ହ୍ରାସ କରେ, କିନ୍ତୁ ଏହା କେବଳ ଗୋଟିଏ ଦିଗ। ଚାଷୀମାନେ କୁହନ୍ତି ଯେ ପ୍ରଥମ ବର୍ଷରେ ଅମଳ 10% ହ୍ରାସ ପାଏ, କିନ୍ତୁ ଦ୍ୱିତୀୟ ବର୍ଷରୁ ଏହା ବୃଦ୍ଧି ପାଏ। ଜୈବିକ କୃଷିରୁ ଆୟ ସମ୍ପର୍କରେ, ଚାଷୀମାନେ କୁହନ୍ତି ଯେ ଯେତେବେଳେ ସେମାନେ ସେମାନଙ୍କର ଶସ୍ୟକୁ ବଜାରକୁ ନେଇ ଘୋଷଣା କରନ୍ତି ଯେ ଏହା ଜୈବିକ ଭାବରେ ଚାଷ କରାଯାଇଛି, ସେମାନେ ରାସାୟନିକ ସାର ବ୍ୟବହାର କରି ଚାଷ କରାଯାଇଥିବା ଶସ୍ୟ ଅପେକ୍ଷା ଅଧିକ ମୂଲ୍ୟ ପାଆନ୍ତି। ଚାଷୀମାନେ କୁହନ୍ତି ଯେ ରାସାୟନିକ ସାର ବ୍ୟବହାର କରି ଚାଷ ଖର୍ଚ୍ଚ ବୃଦ୍ଧି ପାଏ ଏବଂ ଆୟ ହ୍ରାସ ପାଏ, ଯେତେବେଳେ ଜୈବିକ କୃଷି ଖର୍ଚ୍ଚ ହ୍ରାସ ପାଏ ଏବଂ ଅଧିକ ମୂଲ୍ୟ ପାଏ।
जैविक बनाम रासायनिक खेती

आमतौर पर यह माना जाता है कि ज्यादा मात्रा में रासायनिक खाद एवं कीटनाशक इस्तेमाल करने से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और उत्पादन बढ़ने से किसान का मुनाफा बढ़ सकता है। सरकार भी किसानों को वैज्ञानिक ढंग से खेती करने की सलाह देती है, लेकिन इस वैज्ञानिक विधि का अर्थ सिर्फ और सिर्फ रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल तक ही सीमित होता है। नतीजतन आए दिन हम विदर्भ, आंध्र प्रदेश, गुजरात, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा आत्महत्या करने की खबरें सुनते रहते हैं। इसके अलावा रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल से अनाज, सब्जियां, दूध और पानी, जो इंसान के जीवन का प्रमुख आधार हैं, जहरीले बनते जा रहे हैं। इस वजह से इंसानी जीवन धीरे-धीरे खतरे में पड़ता जा रहा है। आज हार्टअटैक, शुगर, ब्लडप्रेशर एवं अन्य कई प्रकार की बीमारियां आम होती जा रही हैं। आज हम जो भी खाते हैं, उसमें रासायनिक तत्वों की अधिकता इतनी ज्यादा होती है कि हमारा खाना मीठा जहर बन चुका है।
फसल उगाने के लिए अंधाधुंध रासायनिक खाद का इस्तेमाल इंसानी जीवन के लिए खतरा तो बना ही है, साथ ही यह जमीन को भी बंजर बनाता जा रहा है। भूमि की उर्वरा शक्ति घटती जा रही है। उत्पादन बढ़ाने के लिए लगातार रासायनिक खाद की मात्रा बढ़ानी पड़ रही है। मिट्टी में जीवाश्म की मात्रा घटती जा रही है। भूमि की भौतिक संरचना एवं रासायनिक गुणों पर इसका विपरीत असर पड़ रहा है। अब सवाल यह है कि क्या इन सारी समस्याओं का कोई समाधान नहीं है? समाधान है, इन सारी समस्याओं का एकमात्र समाधान जैविक खेती है। जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में वर्मी कंपोस्ट मददगार साबित हो रही है। जैविक खेती रासायनिक खेती से सस्ती पड़ती है, क्योंकि इसका कच्चा माल किसान के पास उपलब्ध रहता है, जैसे गोबर से कंपोस्ट खाद, चारे एवं फसलों के अवशेष से तैयार खाद, केचुए की खाद।
ऐपिजेइक केंचुए की इसीनिया फीटिडा प्रजाति (रेड वर्म) से बेहतर जैविक खाद बनाई जा सकती है। वर्मी कंपोस्ट सस्ती होती है, साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाती है। यह जल, भूमि एवं वायु को स्वस्थ बनाती है। इसके उपयोग से कम पानी से भी खेती संभव है। इससे उत्पादन लागत में भी कमी आती है। जैविक विधि से पैदा किया गया अनाज स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक भी होता है। जैविक खेती के क्षेत्र में कई संस्थाओं और कृषि विभाग ने प्रयास शुरू किए हैं। देश के लगभग सभी राज्यों में जैविक कृषि के बारे में जानकारी और प्रोत्साहन दिया जा रहा है। बहुत से किसानों ने जैविक खेती को अपना लिया है। कृषि विभाग किसानों को गोबर एवं केचुआ से जैविक खाद और वर्मी वाश के रूप में कीटनाशक बनाने की ट्रेनिंग देता है। गोमूत्र, नीम, हल्दी एवं लहसुन से हर्बल स्प्रे बनाया जाता है।
जैविक खेती आज किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। विशेषज्ञों ने क्षेत्रों में घूमकर किसानों के अनुभव दर्ज किए और अब उन्हीं अनुभवों को आप सभी तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है, ताकि देश के अन्य किसान भी इससे प्रेरणा ले सकें।आमतौर पर यह धारणा फैलाई जाती है कि जैविक खेती करने से उपज कम हो जाती है, लेकिन यह सिर्फ एक पहलू है। किसानों का कहना है कि पहले साल उपज में दस फीसदी की कमी आती है, लेकिन दूसरे साल से उपज बढ़ जाती है। जैविक खेती से होने वाली आय के बारे में किसान कहते हैं कि जब हम अपना अनाज लेकर मंडी में जाते हैं और कहते हैं कि हमारा अनाज जैविक विधि से उगाया गया है तो हमें रासायनिक खादों से उगाए गए अनाज से अधिक कीमत मिलती हैं। किसानों का कहना है कि रासायनिक खाद का इस्तेमाल करने से खेती की लागत बढ़ जाती है और आमदनी कम हो जाती है, जबकि जैविक विधि से खेती करने पर लागत कम हो जाती है, साथ ही उपज का दाम भी अधिक मिलता है।
साभार: MPKRISHI
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